बायोकॉन लिमिटेड कंपनी की सफलता की कहानी Success Story Biocon Limited

बायोकॉन लिमिटेड कंपनी की सफलता की कहानी

किरण मजूमदार-शॉ एक भारतीय महिला व्यवसायी, टेक्नोक्रेट, अन्वेषक और ‘बायोकॉन लिमिटेड’ की संस्थापक और अध्यक्ष भी हैं, जो बंगलौर में एक अग्रणी जैव प्रौद्योगिकी संस्थान है. ये ‘द स्टोरी ऑफ बीयर’ की लेखिका भी हैं. किरण मजूमदार-शॉ ने वर्ष 1978 में बेंगलुरु के पास कोरमांगला में एक छोटे-से शेड में 10 हजार रुपए की पूंजी से ‘लिकर फरमेंटेशन’ के लिए ‘एंजाइम’ बनाना शुरू किया था।

इनके इस प्रोजेक्ट में आयरलैंड की भागीदार कंपनी बायोकॉन केमिकल्स ने कुछ ही दिनों के बाद अपना शेयर यूनीलीवर को बेच दिया और यूनीलीवर किरण मजूमदार की नई भागीदार बन गई. लेकिन आगे यह भागीदारी किरण मजूमदार के लिए पैरों की बेड़ी बन गई.

यूनीलीवर ने इन्हें कोई अन्य उत्पाद पर शोध कार्य करने की अनुमति नहीं दी. जिसके कारण 25 वर्षों तक बायोकॉन लिमिटेड ‘वन प्रोडक्ट’ कंपनी बनी रही. वर्ष 1998 में किरण मजूमदार का सम्बन्ध यूनीलीवर से समाप्त हो गया और यही वर्ष इनके जीवन का ‘टर्निंग ईयर’ भी था. किरण मजूमदार के ‘बायोकॉन लिमिटेड’ का कारोबार आज लगभग 25 अरब रुपए का हो गया है. इनका विश्व में जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र को नया प्रारूप देने में महत्वपूर्ण योगदान है.

प्रारम्भिक जीवन

किरण मजूमदार-शॉ का जन्म 23 मार्च, 1953 को बेंगलुरु (कर्नाटक) में हुआ था. इन्होंने बेंगलोर के बिशप कॉटन गर्ल्स हाई स्कूल से वर्ष 1968 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. इन्होंने बी.एस.सी (जूलॉजी ऑनर्स) की डिग्री बंगलौर विश्वविद्यालय से वर्ष 1973 में पूरी की. इसके बाद इन्होंने ‘मॉल्टिंग और ब्रूइंग’ विषय पर बैलेरैट कॉलेज, मेलबोर्न यूनिवर्सिटी (ऑस्ट्रेलिया) से वर्ष 1975 में उच्चशिक्षा हासिल की.

इस दौरान इन्होंने मेलबोर्न के ही कार्लटोन और यूनाइटेड ब्रुअरीज, ब्रुअर, बैरेट ब्रदर्स तथा बर्स्टोन में बतौर प्रशिक्षु माल्स्टर के रूप में काम किया. इन्होंने कुछ समय तक कोलकाता के जूपिटर ब्रुअरीज लिमिटेड में तकनिकी सलाहकार और वर्ष 1975-1977 तक बड़ौदा के स्टैंडर्ड मॉल्टिंग कॉरपोरेशन में भी तकनिकी प्रबंधक के रूप में भी काम किया.

वर्ष 1998 में 45 वर्ष की उम्र में उन्होंने स्कॉटलैंड के मूल निवासी जॉन-शॉ से विवाह किया, वर्तमान समय में जॉन शॉ ‘बायोकॉन लिमिटेड’ के उपाध्यक्ष हैं.

‘बायोकॉन लिमिटेड’ की प्रगति में इनका योगदान

प्रारंभ में इन्हें अपनी कम उम्र, लिंग और बगैर परखे गए व्यापार मॉडल के कारण विश्वसनीयता संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा पर इन्होंने तमाम चुनौतियों का सामना किया और सीमित परिस्थिति में ‘बायोकॉन लिमिटेड’ को नई दिशा और प्रगति की ऊंचाइयों पर ले गयीं।

स्थापना के एक वर्ष के अन्दर ‘बायोकॉन लिमिटेड’ एंजाइमों का विनिर्माण करने वाली और संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोप को उनका निर्यात करने वाली भारत की पहली कंपनी बन गई. वर्ष 1989 में ‘बायोकॉन लिमिटेड’ भारत की पहली जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी बनी, जिसे ट्रेडमार्क युक्त प्रौद्योगिकियों के लिए अमेरिका से धन प्राप्त हुआ.

वर्ष 1990 में इन्होंने ‘बायोकॉन लिमिटेड’ के उन्नत आन्तरिक अनुसंधान कार्यक्रम को ट्रेडमार्क युक्त सान्द्र अधःस्तर खमीरण प्रौद्योगिकी पर आधारित बनाया. वर्ष 1997 में इन्होंने मानव स्वास्थ्य के क्षेत्र में पहल की.

वर्ष 1998 में जब यूनीलीवर अपनी हिस्सेदारी ‘बायोकॉन लिमिटेड’ में बेचने को तैयार हुआ तो यह एक स्वतंत्र संस्था बन गई. दो साल बाद इसका ट्रेडमार्क युक्त सान्द्र मैट्रिक्स खमीरण पर आधारित बायो-रिएक्टर बना, जिसका नामकरण ‘प्लैफरेक्टर टीएम’ (Plafractor TM) किया गया था. किरण मजूमदार-शॉ ने कंपनी को विशेष दवाइयों के उत्पादन के लिए पहला पूरी तरह से स्वचालित जलमग्न खमीरण संयंत्र बनाया. वर्ष 2003 तक ‘बायोकॉन लिमिटेड’ मानव इंसुनिल विकसित करने वाली दुनिया की पहली कंपनी बन गई.

वर्ष 2004 में इन्होंने पूंजी बाजार तक पहुंचने के लिए ‘बायोकॉन लिमिटेड’ के शोध कार्यक्रमों को विकसित करने का फैसला किया. बायोकॉन का आईपीओ 32 बार ओवर सब्सक्राइब हुआ और पहले दिन 1.11 बिलियन डॉलर के बाजार मूल्य के साथ बंद हुआ, सूचीबद्ध होने के पहले ही दिन ‘बायोकॉन लिमिटेड’ 1 बिलियन डॉलर के निशान को पार करने वाली भारत की दूसरी कंपनी बन गई.

दवा व्यसाय के क्षेत्र में योगदान

इंग्लैंड की मशहूर पत्रिका ‘द मेडिसिन मेकर’ ने दवा क्षेत्र की 100 हस्तियों की सूची में किरण को दूसरे नंबर पर रखा है. खास बात यह है कि पत्रिका ने भारत से सिर्फ किरण मजूमदार को इस सूची में जगह दी है.

भारतीय कंपनी ‘बायोकॉन लिमिटेड’ की सीएमडी किरण मजूमदार-शॉ दवा बनाने वाली दुनिया की दूसरी सबसे शक्तिशाली हस्ती हैं, जो एंथनी फॉची (डायरेक्टर) नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शस डिजीज, अमेरिका, के बाद दूसरे स्थान पर हैं.

ये जैव-प्रौद्योगिकी को एक क्षेत्र के रूप में बढ़ावा देने में रुचि रखती हैं तथा भारत सरकार के जैव-प्रौद्योगिकी विभाग के सलाहकार परिषद् की सदस्य भी हैं.

प्रमुख सम्मान एवं पुरस्कार

वर्तमान में 62 वर्षीय किरण ‘बायोकॉन लिमिटेड’ की अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक हैं. इसके अतिरिक्त ये आईआईएम बेंगलुरु की मौजूदा अध्यक्ष भी हैं.

साइंस और केमिस्ट्री में खास योगदान के लिए इन्हें फिलाडेल्फिया (अमेरिका) में ‘ओथमेर स्वर्ण पदक-2014′ प्रदान किया गया था. ये विश्व की तीसरी और पहली भारतीय महिला हैं जिन्हें ‘ओथमेर स्वर्ण पदक’ मिला हैं. फोर्ब्स पत्रिका ने इन्हें वर्ष 2014 में दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में 92वें स्थान पर रखा था.

वर्ष 2007-08 में अमेरिका के एक प्रमुख व्यापार प्रकाशन ‘मेड एड न्यूज’ ने बायोकॉन को दुनिया भर की जैव-प्रौद्योगिकी कंपनियों में 20वां और दुनिया के सबसे बड़े नियोक्ताओं में 7वां स्थान दिया था.

अपने अग्रणी कार्यों के लिए इन्हें भारत सरकार के प्रतिष्ठित पद्मश्री (1989) और पद्म भूषण (2005) पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है. हाल ही में ‘टाइम पत्रिका’ के दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में इनका नाम भी शामिल किया गया है तथा ये दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की फोर्ब्स की सूची और फाइनेंशियल टाइम्स के कारोबार में शीर्ष 50 महिलाओं की सूची में भी शामिल हैं.

वर्ष 2004 में जैव-प्रौद्योगिकी में इनके योगदानों के लिए इनकी मातृ संस्थान बैलेरैट यूनिवर्सिटी ने उन्हें विज्ञान का मानद डॉक्टरेट उपाधि प्रदान किया, इसके अलावा यूके के डंडी यूनिवर्सिटी ने वर्ष 2007, यूके की ग्लासगो यूनिवर्सिटी ने वर्ष 2008 और यूके के एडिनबर्ग की हेरिएट-वाट यूनिवर्सिटी वर्ष में 2008 ने भी उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया.

समाज सेवा के क्षेत्र में योगदान

वर्ष 2004 में इन्होंने समाज के गरीब और कमजोर वर्गों को लाभ पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और पर्यावरण कार्यक्रम संचालित करने के लिए ‘बायोकॉन फाउंडेशन’ शुरू किया. फाउंडेशन के ‘सूक्ष्म-स्वास्थ्य बीमा’ कार्यक्रम के अंतर्गत 70,000 ग्रामीण सदस्यों का नामांकन किया गया है.

इन्होंने वर्ष 2007 में डॉ. देवी शेट्टी के. नारायण दृदयालय के साथ मिलकर बंगलौर के बूम्मसंद्रा के नारायण हेल्थ सिटी परिसर में 1,400 बिस्तरों वाले कैंसर देखभाल केंद्र की स्थापना की है. यह मजूमदार-शॉ कैंसर सेंटर (MSCC) के नाम से जाना जाता है.

अन्य क्षेत्रों में योगदान

किरण मजूमदार-शॉ भारत सरकार की एक स्वायत्त निकाय ‘इंडियन फार्माकोपिया कमीशन’ के प्रबंध निकाय और सामान्य निकाय की सदस्य हैं. ये स्टेम सेल बायोलॉजी एंड रिजेनरेटिव मेडिसीन के लिए बने संस्थान की सोसाइटी की संस्थापक सदस्य भी हैं.

ये भारत सरकार के नेशनल इनोवेशन कौंसिल की एक सदस्य और बंगलौर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के प्रशासक मंडल की सदस्य हैं और कर्नाटक में आयरिश दूतावास की मानद वाणिज्य दूत हैं.

Source : itshindi
Spread the love
  • 23
    Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *